भकुर्रा महादेव की महिमा अपरंपार महाशिवरात्रि पर उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब, बोल बम के जयघोष से गूंज उठा भूतेश्वर धाम

गरियाबंद। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर ग्राम मरोदा स्थित भूतेश्वर नाथ महादेव धाम में आज सुबह से ही आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। तड़के 4 बजे से ही श्रद्धालु मंदिर पहुंचने लगे और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। देर रात गुलाल और फूलों से शिवलिंग का भव्य श्रृंगार किया गया, जिसके बाद भक्तों ने विधि-विधान से पूजन-अर्चना की।

राज्य के सबसे शिवधामों में शामिल भूतेश्वरनाथ में एक दिन पूर्व से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी थी। आज शिवालय से बाबा भूतेश्वरनाथ की भव्य पालकी निकाली जाएगी, जिसे लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। मंदिर परिसर में लंबी कतारें लगी हुई हैं और भक्त बेलपत्र, दूध और जल से अभिषेक कर अपनी मनोकामनाएं मांग रहे हैं।

श्रद्धालु ऋषिकांत मोहरे ने महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर कहा,

“भूतेश्वर नाथ महादेव के दर्शन मात्र से ही मन को अद्भुत शांति मिलती है। मैं हर वर्ष महाशिवरात्रि पर यहां आकर जलाभिषेक करता हूं। बाबा के दरबार में जो भी सच्चे मन से प्रार्थना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। इस बार भी पूरे परिवार के साथ पूजा-अर्चना कर प्रदेश की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की है। यहां का दिव्य वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य अपने आप में अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति देता है।”उन्होंने आगे कहा कि इतनी विशाल स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन करना अपने आप में सौभाग्य की बात है और प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्थाएं भी सराहनीय हैं, जिससे श्रद्धालुओं को सुगमता से दर्शन लाभ मिल रहा है।

अर्धनारीश्वर स्वरूप और बढ़ती ऊंचाई का रहस्य

भूतेश्वरनाथ महादेव को ‘भकुर्रा महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि शिवलिंग को  अर्धनारीश्वर का प्रतीक माना जाता है। शिवलिंग के पीछे भगवान शिव की प्रतिमा में माता पार्वती, श्रीगणेश, कार्तिकेय और नंदी विराजमान हैं।

इस स्वयंभू शिवलिंग की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निरंतर बढ़ती ऊंचाई है, जो आज भी शोध का विषय बनी हुई है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1978 में इसकी ऊंचाई लगभग 48 फीट थी, जो 1987 में 55 फीट, 1996 में 62 फीट और 2022 में लगभग 72 फीट तक पहुंच चुकी है। लगभग 210 फीट के गोलाकार विस्तार वाला यह शिवलिंग विश्व के विशालतम प्राकृतिक शिवलिंगों में गिना जाता है।

‘भकुर्रा महादेव’ नाम की कथा

आजादी से पहले यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित था। चरवाहे यहां मवेशी चराने आते थे। उस समय शिवलिंग मात्र तीन फीट ऊंचा था। मान्यता है कि गौवंश इस पत्थर के चारों ओर मंडराते थे और जंगल में सांड के ‘भकुर्राने’ (रंभाने) की ध्वनि सुनाई देती थी। जब शिवलिंग का आकार बढ़ने लगा तो लोगों को इसके चमत्कारिक स्वरूप का आभास हुआ और नंदी के भकुर्राने की कथा के कारण इसका नाम ‘भकुर्रा महादेव’ प्रचलित हो गया।

गिरिवन से गरियाबंद तक आस्था की यात्रा

गरियाबंद का यह समूचा क्षेत्र पर्वत और वनों से आच्छादित रहा है, जिसे प्राचीन काल में ‘गिरिवन’ कहा जाता था। भूमि, अग्नि, आकाश, वायु और जल—इन पंचभूतों के स्वामी भगवान शिव यहां भूतेश्वरनाथ के रूप में विराजमान हैं। हरे-भरे प्राकृतिक परिवेश के बीच स्थित यह धाम शिवभक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।

महाशिवरात्रि पर यहां तीन दिनों तक मड़ई-मेला का आयोजन किया जाता है। प्रदेश के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। जन-आस्था को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं, ताकि दर्शन व्यवस्था सुचारू बनी रहे।

व्रत, रुद्राभिषेक और जलाभिषेक की परंपरा

मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन वैदिक मंत्रों के जाप के साथ जलाभिषेक और व्रत-पूजन करने से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं। सावन में कांवरिए यहां जल चढ़ाने का बेसब्री से इंतजार करते हैं, वहीं आज महाशिवरात्रि पर हजारों श्रद्धालु रुद्राभिषेक और विशेष पूजन में भाग ले रहे हैं।

कहा जाता है कि भूतेश्वरनाथ महादेव के दर्शन मात्र से कष्ट दूर होते हैं और सच्चे मन से मांगी गई मुराद अवश्य पूर्ण होती है। यही आस्था हर वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि का कारण बन रही है।

महाशिवरात्रि के इस पावन दिन गरियाबंद का मरोदा गांव भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर है—जहां हर ओर गूंज रहा है…

“बोल बम! हर-हर महादेव!”

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