कांकेर : कांकेर जिले में एक पिता अपने दिव्यांग बेटे के जीवन में शिक्षा का उजाला भरने के लिए उसे 10 किलोमीटर दूर खुद पैदल चल कर स्कूल पहुंचाते और लाते हैं। पिता प्रहलाद यादव खुद पैदल चल कर बेटे की व्हील चेयर चलाते हुए स्कूल लाना-ले जाना करते हैं, ताकि बच्चे के पढ़ने का सपना पूरा कर सकें।
नरहरपुर विकासखंड के चोरिया देहानपारा में प्रहलाद यादव अपने माता-पिता, पत्नी, दिव्यांग बेटे आनंद यादव और उसकी छोटी बहन के साथ रहते हैं। बेटा आनंद चलने-फिरने से लाचार है। वो शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सरोना में कक्षा 9वीं का छात्र है और पढ़-लिखकर इंजीनियर बनना चाहता है। उसके इसी सपने को पूरा करने के लिए आर्थिक रूप से कमजोर उसका परिवार दिनरात मेहनत कर रहा है। पिता प्रहलाद के साथ-साथ उसके 70 वर्षीय दादा भी खुद नंगे पांव चलकर उसे स्कूल तक पहुंचाते हैं। दिव्यांग आनंद यादव की छोटी बहन कक्षा 7वीं में पढ़ती है।
आनंद का घर ग्राम दलदली से आगे चोरिया देहानपारा में है। उनके घर से स्कूल की दूरी करीब 5 किलोमीटर है। वहां आने-जाने में कुल 10 किलोमीटर का सफर करना पड़ता है।
इसके लिए आनंद के 70 वर्षीय दादा सगराम यादव भी कई दिन अपने पोते को स्कूल पहुंचाते हैं और स्कूल में छुट्टी होने तक स्कूल के आसपास ही रहते हैं और फिर वापस आनंद को घर लाते हैं। इससे पहले दादी प्यारी बाई यादव भी ये जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभा रही थीं, लेकिन अब उम्र हो जाने के कारण वे अक्सर व्हील चेयर खींचकर बच्चे को स्कूल से पहुंचाना-लाना नहीं कर पाती हैं।
दिव्यांग छात्र आनंद कहते हैं कि उनकी पढ़ाई के लिए उनका परिवार जो संघर्ष कर रहा है, उन्हें उस पर गर्व है। उन्होंने बताया कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के बावजूद भी ठंड हो या बारिश, उनके पिता या दादा अपने सारे काम छोड़कर उन्हें पैदल व्हील चेयर से स्कूल पहुंचाते और लाते हैं। उन्होंने कहा कि मैं इंजीनियर बनना चाहता हूं और ये मैं जरूर करूंगा।
सरकारी मदद की आस
आनंद का घर बेहद जर्जर हो चुका है। घर का दरवाजा बांस के छोटे-छोटे टुकड़ों से बना हुआ है। वे कहते हैं कि उन्हें सरकारी आवास की उम्मीद है, क्योंकि उनके घर की दीवारें कब ढह जाए, कुछ पता नहीं।
घर चलाने के लिए उनके पिता मजदूरी करते हैं और एक एकड़ पैतृक जमीन का सहारा है। बुजुर्ग दादा-दादी को वृद्धावस्था पेंशन भी नहीं मिल रहा है। आनंद को भी दिव्यांगता के लिए कोई पेंशन नहीं मिल रहा।
हालांकि सरकारी राशन मिल रहा है, लेकिन पंचायत से आनंद का अलग से राशन कार्ड नहीं बनने के कारण दिव्यांगों को 10 किलो निशुल्क मिलने वाला राशन भी नहीं मिल पा रहा है।
आनंद के पिता प्रहलाद यादव ने कहा कि उनके बेटे को 3 साल पहले एक व्हील चेयर मिला था, जिससे वो आना-जाना कर रहा है। इसके अलावा और कोई सरकारी सहायता नहीं मिल पाई है। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि आनंद की शिक्षा के लिए सरकार कोई मदद करे।










